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जयमाल में गंगा आरती: आस्था की गरिमा या आधुनिक प्रदर्शन?

वेदान्त सिंह की रिपोर्ट
गोरखपुर (वेदांत टाइम्स/बस्ती टाइम्स 24)। भारतीय संस्कृति में विवाह केवल सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार है। वैदिक परंपरा में विवाह को सोलह संस्कारों में विशेष स्थान प्राप्त है। किंतु वर्तमान समय में विवाह समारोहों में कई नवीन प्रयोग देखने को मिल रहे हैं। उन्हीं में से एक है—जयमाल के समय गंगा आरती का आयोजन।
प्रश्न यह है कि क्या यह परंपरागत रूप से उचित है?
गंगा भारतीय आध्यात्मिक चेतना की जीवनधारा मानी जाती हैं। गंगा आरती की परंपरा विशेष रूप से गंगा तटों पर विकसित हुई—जैसे दशाश्वमेध घाट और हरिद्वार की हर की पौड़ी—जहाँ संध्या समय दीपों की ज्योति के साथ जल और प्रकृति के प्रति सामूहिक कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
विवाह संस्कार की वैदिक विधियों—कन्यादान, पाणिग्रहण, सप्तपदी और अग्नि प्रदक्षिणा—में गंगा आरती का कोई उल्लेख नहीं मिलता। अतः इसे शास्त्रसम्मत अनिवार्य अंग नहीं कहा जा सकता।
फिर भी यदि विवाह में गंगा स्तुति श्रद्धा, मर्यादा और भावनात्मक समर्पण के साथ की जाए, तो यह अनुचित नहीं है। गंगा पवित्रता का प्रतीक हैं और विवाह जीवन की नई धारा का आरंभ। इस दृष्टि से यह प्रतीकात्मक रूप से सार्थक हो सकता है।
चिंता का विषय तब बनता है जब धार्मिक अनुष्ठान केवल मंचीय आकर्षण या सोशल मीडिया प्रदर्शन का साधन बन जाए। आध्यात्मिकता का मूल उद्देश्य अंतर्मन की शुद्धि है, न कि बाहरी आडंबर।
समाज को यह समझना होगा कि परंपरा का सम्मान उसके भाव में है, न कि केवल उसके दृश्य रूप में। यदि हम धार्मिक प्रतीकों का उपयोग मर्यादा और समझदारी के साथ करें, तो आधुनिकता और परंपरा का संतुलन संभव है।
विवाह का वास्तविक संदेश प्रेम, उत्तरदायित्व और संस्कार है। यदि इस पावन अवसर पर हम प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें, तो वही सच्ची आरती होगी—चाहे दीपक गंगा तट पर जले या हमारे हृदय में।
✍️ लेखक
डॉ. शोभित कुमार श्रीवास्तव
(पर्यावरण चिंतक, शिक्षाविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता)

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