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विश्व आर्द्रभूमि दिवस : जब जल बचेगा, तभी कल बचेगा – डॉ शोभित श्रीवास्तव 

बस्ती से वेदान्त सिंह

 

गोरखपुर (वेदांत टाइम्स/बस्ती टाइम्स 24)। हर वर्ष 2 फ़रवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाता है, लेकिन यह दिन केवल एक औपचारिक तिथि नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा दिया गया वह स्मरण है, जो हमें जल, जीवन और भविष्य के आपसी संबंध को समझने का अवसर देता है। आर्द्रभूमियाँ—जैसे तालाब, झीलें, दलदल, नदी किनारे की भूमि और मौसमी जलभराव वाले क्षेत्र—धरती की जीवन रेखा हैं।

आर्द्रभूमियाँ प्राकृतिक जल-प्रबंधन की सबसे प्रभावी व्यवस्था हैं। ये वर्षा जल को संचित कर भूजल स्तर बनाए रखती हैं और बाढ़ व सूखे के प्रभाव को नियंत्रित करती हैं। जिस क्षेत्र में आर्द्रभूमियाँ सुरक्षित रहती हैं, वहाँ जल संकट अपेक्षाकृत कम होता है। यह संयोग नहीं है कि आज जिन शहरों और गाँवों में जल की भारी कमी है, वहाँ अधिकांश पारंपरिक तालाब और झीलें समाप्त हो चुकी हैं।

जैव विविधता के संरक्षण में आर्द्रभूमियों की भूमिका अद्वितीय है। ये असंख्य जलीय जीवों, पक्षियों और वनस्पतियों का सुरक्षित आश्रय स्थल हैं। प्रवासी पक्षियों का आगमन इस बात का प्रमाण है कि आर्द्रभूमियाँ केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। ग्रामीण भारत में मत्स्य पालन, पशुपालन और कृषि जैसी आजीविकाएँ सीधे तौर पर इन्हीं जलस्रोतों पर निर्भर हैं।

चिंताजनक तथ्य यह है कि अनियंत्रित शहरीकरण, अतिक्रमण, औद्योगिक अपशिष्ट और प्लास्टिक प्रदूषण ने आर्द्रभूमियों को तेज़ी से नष्ट किया है। विकास के नाम पर जलस्रोतों को पाट देना एक ऐसी भूल है, जिसकी कीमत समाज को लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में आर्द्रभूमियाँ प्राकृतिक ढाल का कार्य करती हैं, लेकिन उनके विनाश से यह सुरक्षा भी कमजोर हो रही है।

विश्व आर्द्रभूमि दिवस हमें यह सोचने पर विवश करता है कि संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए सामुदायिक सहभागिता, जन-जागरूकता और पारंपरिक जल संरक्षण पद्धतियों को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक यदि अपने आसपास के एक तालाब, झील या जलधारा को बचाने का संकल्प ले, तो यह एक बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

आज आवश्यकता है कि हम आर्द्रभूमियों को विकास में बाधा नहीं, बल्कि सतत विकास का आधार मानें। जल का सम्मान ही जीवन का सम्मान है। यदि आज हमने आर्द्रभूमियों की अनदेखी की, तो भविष्य की पीढ़ियाँ हमें जलविहीन धरती की विरासत सौंपने के लिए जिम्मेदार ठहराएँगी।

आइए, इस विश्व आर्द्रभूमि दिवस पर संकल्प लें—

आर्द्रभूमियाँ बचेंगी, तभी भविष्य बचेगा।

लेखक : डॉ. शोभित कुमार श्रीवास्तव

Vedant Singh

Vedant Singh S/O Dr. Naveen Singh Mo. Belwadandi Po. Gandhi Nagar Basti Pin . 272001 Mob 8400883291 BG . O Positive vsvedant12345@gmail.com

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