कहानियां

हृदय सार

 

लेखिका : अंजली पाण्डेय

पता नहीं क्यों अब मन अकेले रहने को कहता है।

किसी से बात करने का मन नहीं करता।

धीरे-धीरे दिल इतना निष्ठुर हो गया है कि कोई कितना भी अच्छा क्यों न हो, उससे लगाव ही नहीं हो पाता।

एक बात आपने भी गौर की होगी—

जब मन में पीड़ा अपनी सीमा पार कर जाती है, तो दिमाग शून्य हो जाता है।

तब दिल ऐसा व्यवहार करने लगता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

और जब अपने मन की बातें किसी से कह न पाओ, तो वही बातें कुंठा बनकर दिमाग की नसों में बैठ जाती हैं।

एक समय के बाद भगवान से भी कुछ माँगने की इच्छा नहीं होती।

मन में बहुत-सी इच्छाएँ चलती रहती हैं,

वे बातें ज़ुबान तक आती हैं,

नज़रें भगवान को देखती हैं

और फिर आँसू भर आते हैं।

तभी मन के भीतर से आवाज़ आती है—

इनसे माँगने का क्या फ़ायदा, मिलना तो है नहीं।

मैं हर बार की तरह इस बार भी माँगूँगी,

और हर बार की तरह इस बार भी मुझे सब्र का कटोरा ही थमा दिया जाएगा।

अंत में जब खुद को खुद ही समझाना है,

तो क्यों न इस पूरी प्रक्रिया से पहले ही खुद को समझा लिया जाए।

कई बार ऐसा लगता है कि प्रभु कुछ और करना चाहते हैं,

पर होता कुछ और ही है।

जैसे— प्रभु मेरे भीतर से मोह निकालना चाहते थे

ताकि मुझे किसी के दूर जाने का कष्ट न हो,

पर मोह निकालने के प्रयास में

उन्होंने मेरे भीतर से पूरा प्रेम-रस ही निकाल दिया।

अब चाहकर भी मैं किसी से प्रेम नहीं कर पाती।

प्रेम के मामले में मेरे हृदय में एक अनजाना-सा डर बस गया है।

अब तक जीवन को जिस तरह देखा है,

उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि

मेरा सबसे दूर रहना ही ठीक है।

दूसरी बात यह कि

प्रभु ने मेरे नादान हृदय को मज़बूत बनाने के प्रयास में

उसे अत्यधिक कठोर बना दिया।

मेरे भीतर एक अजीब-सा डर पनप रहा है—

जैसे जब तक कोई और मुझे चाहेगा,

तब तक शायद मैं उसके पास रहूँगी,

पर जैसे ही मैं उसे चाहूँगी,

वह दूर चला जाएगा।

यही कारण है कि मैं किसी से भी दोस्ती नहीं करती,

और यदि दोस्ती हो भी जाए

तो उसे कभी आगे नहीं बढ़ने देती।

प्रभु ने मुझे इतना समझदार बना दिया है

कि अब मैं बेफिक्री से हँस भी नहीं पाती।

मेरे हृदय की स्थिति अब ऐसी है

कि भगवान के सामने जाकर भी

कुछ माँगने का मन नहीं करता।

मन इतना चोटिल हो चुका है

कि यदि कोई प्रेम से बात करता है,

तो काफी समय तक उस पर विश्वास ही नहीं होता।

पता नहीं क्यों अब अकेलेपन से डर नहीं लगता।

मन करता है कि एक अपना-सा घर हो,

जहाँ मैं अपनी मर्जी से रहूँ,

अपने लिए जियूँ,

अपनी खुशियों में खुश रहूँ।

मैं खुद में पहले जैसी चंचलता तलाश रही हूँ।

मुझे लगता है कि

मेरे इस हृदय सार को पढ़कर

आपको भी अपने दिल में दबी बातें,

अपनी शरारतें और अपनी चाहतें याद आ गई होंगी।

मैं बस यही कहूँगी—

आप भी मेरी तरह

अपनी चंचलता की तलाश जारी रखिए

और अपने जीवन में आने वाले

हर एक पल को भरपूर जीएँ।

Viyasmani Tripaathi

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