कविताएं

बाबा मुझको घर देना

 

✍️ अंजली पाण्डेय

बाबा, मुझको घर देना,

हाँ मुझको मेरा घर देना।

ज़रा गौर से देखो मुझको,

मैं हूँ तेरी नन्ही कली।

तेरे दान करते ही बाबा,

मैं तो दूजे घर को चली।

साड़ी-कपड़े भी रख लेना,

रख लेना तुम सारे ज़ेवर।

पर इतना ध्यान रहे बाबा,

सहना पड़े न किसी के तेवर।

जब नाज़ों से पाला है,

तो आज़ादी के पर भी देना।

अगर जी चाहे कुछ भी देने को,

तो सबसे पहले घर देना।

बाबा, मुझको घर देना,

हाँ मुझको मेरा घर देना।

मैंने सुना है लोगों से,

घर होता नहीं है बेटी का।

अच्छी नीयत का कोई क्या करे,

जब मोल लगे दहेज की पेटी का।

पहले करते जो पाणिग्रहण,

वही रिश्ता तोड़ देते हैं।

एक वंश की चाह में बाबा,

अर्धांगिनी को छोड़ देते हैं।

कट सकूँ इन बेड़ियों को,

मुझको ऐसा खंजर देना।

अगर जी चाहे कुछ भी देने को,

तो सबसे पहले घर देना।

बाबा, मुझको घर देना,

हाँ मुझको मेरा घर देना।

 

Viyasmani Tripaathi

Cheif editor Mobile no 9795441508/7905219162

Related Articles

Back to top button