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काशी से संगम तक संकटमोचक बने केशव मौर्य: धर्मसंकट में भाजपा सरकार को संभालने की फिर निभाई भूमिका

डॉ राम दयाल भाटी की रिपोर्ट

 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो संकट के समय पार्टी और सरकार दोनों के लिए ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ऐसे ही नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब बात राजनीतिक और धार्मिक संतुलन साधने की हो, तो वे संवाद, सम्मान और समाधान का रास्ता चुनते हैं।

चाहे 2019 का काशी विश्वनाथ कॉरिडोर विवाद हो या 2026 के माघ मेला में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा ताजा धर्म-संकट—हर बार केशव मौर्य भाजपा सरकार के लिए “संकटमोचक” की भूमिका में नजर आए हैं।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर: जब भाजपा चारों ओर से घिर गई थी

साल 2019। लोकसभा चुनाव की तपिश चरम पर थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का निर्माण अंतिम चरण में था। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट था—भगवान विश्वनाथ के मंदिर को गंगा से सीधे जोड़ना और श्रद्धालुओं को सकरी गलियों से राहत दिलाना।

लेकिन इसी बीच विपक्ष ने यह नैरेटिव गढ़ दिया कि “भाजपा सरकार प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त कर रही है।”

यह मुद्दा इतनी तेजी से फैला कि भाजपा का नेतृत्व और कार्यकर्ता असहज नजर आने लगे। कई मीडिया रिपोर्टों में यह प्रचारित किया गया कि सैकड़ों मंदिर तोड़े जा रहे हैं, जिससे पार्टी बैकफुट पर चली गई।

लाइव कैमरे पर आया टर्निंग पॉइंट

इसी दौरान तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री केशव प्रसाद मौर्य का काशी दौरा हुआ। भगवान विश्वनाथ का रुद्राभिषेक करने के बाद वे गंगा में बजरे पर एक टीवी कार्यक्रम के लिए जा रहे थे। तभी एक प्रमुख न्यूज चैनल की टीम ने उन्हें रोक लिया और कैमरा उन स्थानों की ओर घुमाया गया, जहां वर्षों से जमीन में दबे मंदिरों के अवशेष दिखाई दे रहे थे।

सीधा सवाल किया गया—

“क्या भाजपा कॉरिडोर के नाम पर मंदिर तोड़ रही है?”

यहीं से पूरी बहस की दिशा बदल गई।

एक वाक्य, जिसने बदल दी पूरी बहस

केशव मौर्य ने लाइव कैमरे पर बेहद स्पष्ट और संतुलित शब्दों में कहा—

“हम मंदिर बनाने वाले लोग हैं, मंदिर तोड़ने वाले नहीं।”

उन्होंने आगे कहा कि जो मंदिर वर्षों से जमीन में दबे थे, वे अब भगवान की इच्छा से प्रकट हो रहे हैं और सरकार उनका जीर्णोद्धार कराएगी।

यही एक बयान भाजपा के लिए संजीवनी बन गया।

पार्टी कार्यकर्ता मुखर हुए, विपक्ष का नैरेटिव कमजोर पड़ा और धीरे-धीरे पूरा विवाद ठंडा हो गया।

2026 का माघ मेला और शंकराचार्य विवाद: फिर सामने आए संकटमोचक

अब 2026 के माघ मेला में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े घटनाक्रम ने सरकार को एक बार फिर धर्म और राजनीति के संवेदनशील मोड़ पर खड़ा कर दिया। इस बार भी सरकार के भीतर और बाहर असहजता दिखी, लेकिन एक बार फिर केशव प्रसाद मौर्य ने संवाद और संतुलन की भूमिका निभाकर स्थिति को संभालने की कोशिश की।

उन्होंने टकराव की बजाय सम्मान और बातचीत का रास्ता चुना, जिससे सरकार को बैकफुट पर जाने से बचाया जा सके।

भाजपा के लिए “फायर फाइटर” की भूमिका

राजनीतिक गलियारों में केशव मौर्य को अब भाजपा का “फायर फाइटर” कहा जाने लगा है—

जो हर उस मौके पर आगे आते हैं, जब मामला आस्था, संगठन और सरकार की साख से जुड़ जाता है।

निष्कर्ष

काशी से संगम तक, 2019 से 2026 तक, केशव प्रसाद मौर्य बार-बार यह साबित करते रहे हैं कि वे सिर्फ सत्ता के उपमुख्यमंत्री नहीं, बल्कि संकट के समय सरकार के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकारों में से एक हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनकी यह भूमिका आने वाले समय में और भी अहम मानी जा रही है।

Dr Ram Dayal Bhati

Editor Rajasthan Mobile Number 97848 14914

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