कविताएं

लाज़मी कदम

 

✍️ लेखिका: अंजली पाण्डेय

जब भी मैं कभी ज़िंदा प्यार के बारे में सोचती हूँ, तो मुझे उस महिला की याद आ जाती है, जो मुझे तमिलनाडु में मिली थी।

एक बार मैं अपने कुछ साथियों के साथ तमिलनाडु घूमने गई थी। वहाँ हम कई जगहों पर घूमे। कुछ दिनों बाद मेरे सभी साथी अलग-अलग जगहों के लिए निकल गए, कुछ वापस अपने घर चले गए। केवल मैं और मेरा एक दोस्त ही वहाँ रह गए।

तमिलनाडु में हमारे एक मित्र थे — अजीत। हम उन्हीं के घर रुके थे।

एक दिन हम पास के एक अनाथाश्रम “लिटिल एंजल्स कॉन्वेंट” गए। वहाँ बच्चों के साथ समय बिताकर मुझे बहुत सुकून मिला। लेकिन वहाँ की हेड मैडम — मिस हेलन — उन्हें देखकर मेरे मन में एक अलग ही एहसास हुआ।

उस दिन तो मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन अगले दिन फिर वहाँ गई। कुछ देर बच्चों से बात की और फिर मैं और मिस हेलन हॉस्टल के बाहर बगीचे में आकर बैठ गए। मैंने बहुत ही शांति से उनके मन की बात जानने की कोशिश की।

शायद उन्हें मुझ पर भरोसा हो गया था। उन्होंने अपने जीवन की कहानी बताई।

वह पश्चिम बंगाल की रहने वाली थीं। वह एक लड़के से प्यार करती थीं, लेकिन जब यह बात उनके घरवालों को पता चली तो उनके साथ बहुत बेरहमी से व्यवहार किया गया और ज़बरदस्ती उनकी शादी निरंजन दास नाम के एक ज़मींदार से करा दी गई।

शुरुआत के दो साल तक रिश्ता ठीक चला, लेकिन उसके बाद ससुराल वालों ने वंश के नाम पर उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। कुछ महीनों बाद उनके पति की दूसरी शादी भी करवा दी गई।

उनका दिल तो पहले ही टूट चुका था — पहले घरवालों ने ज़बरदस्ती पराया कर दिया और फिर पति दूसरी औरत ले आया।

उन्होंने तय कर लिया —

“अब तक मैं सबकी इज़्ज़त की परवाह करती रही, अब नहीं। पिता ने दान करके अपना हक खत्म कर दिया और पति ने सौतन लाकर… अब बचा ही क्या है?”

एक दिन वह अपने सारे गहने लेकर घर छोड़कर सीधे तमिलनाडु चली आईं। यहाँ उनकी एक सहेली थी, जो इसी अनाथाश्रम में काम करती थी। उसी ने उन्हें यहाँ नौकरी दिलवा दी।

उन्होंने पहले सिर्फ 12वीं तक पढ़ाई की थी, लेकिन बाद में ग्रेजुएशन किया, फिर मास्टर्स भी किया।

इसी बीच उन्होंने एक बार अपने पुराने प्रेमी को फोन किया — तब पता चला कि उसकी शादी हो चुकी है और उसकी एक बेटी भी है। उन्होंने वहीं खुद को रोक लिया। उन्हें पता था कि अगर अब दोबारा उस आदमी की ज़िंदगी में दखल दिया, तो एक परिवार टूट जाएगा।

उस दिन के बाद उन्होंने न अपने घरवालों से बात की, न अपने प्रेमी से।

उन्होंने अपना पूरा जीवन उन अनाथ बच्चों को समर्पित कर दिया।

जब वह यह सब बता रही थीं, तो उनकी आँखें आँसुओं से भर आई थीं। फिर उन्होंने अपने आँसू पोंछे, मुस्कुराईं और बहुत ही सादगी से कहा —

“अब मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। मैं इन बच्चों में बहुत खुश हूँ।”

उनके चेहरे की शांति बता रही थी कि उन्होंने खुद को बहुत मेहनत से संभाला है।

उनसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा… और फिर मैं चुपचाप कॉन्वेंट से वापस लौट आई।

Viyasmani Tripaathi

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