कविताएं

“अकेलापन”

 

✍️ लेखिका: अंजली पाण्डेय

कुछ इस कदर मैं ज़िंदगी में अकेली हो गई,

तक़दीर मेरी उलझी हुई एक पहेली हो गई।

कुछ इस कदर मैं ज़िंदगी में अकेली हो गई।

क्या कहूँ, कोई बात नहीं है,

क्या सुनूँ, कुछ ख़ास नहीं है।

जी करता है वारूँ तुझपे सारा जहाँ,

पर क्या दूँ, कुछ भी मेरे पास नहीं है।

जब से मैं ग़मों की सहेली हो गई,

तब से मैं ज़िंदगी में अकेली हो गई।

तक़दीर मेरी उलझी हुई पहेली हो गई,

कुछ इस कदर मैं ज़िंदगी में अकेली हो गई।

गया इश्क़, गई इज़्ज़त, यार भी गया,

गया घर, गया परिवार, वो संसार भी गया।

हुए भेदभाव और लगे इल्ज़ाम भी,

नसीब का तूफ़ान सब बहा ले गया।

अंधेरों में रहकर मैं अंधेरों की हो गई,

तब से मैं ज़िंदगी में बहुत अकेली हो गई।

कुछ इस कदर मैं ज़िंदगी में अकेली हो गई,

तक़दीर मेरी उलझी हुई पहेली हो गई।

Viyasmani Tripaathi

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