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हम आज तक न भूले

 

लेखिका: अंजली पाण्डेय

लोगों को मैंने कई बार बहुत आसानी से कहते सुना है—

“जब उसने हमें भुला दिया, तो हमने भी उसे भुला दिया।”

लेकिन मेरा मानना है कि जो एहसास रूह तक उतर जाता है, वह जिस्म के साथ ही मिटता है। अगर तुम्हें लगता है कि तुमने उसे भुला दिया है, तो अब तक तुम बस खुद को ही भ्रम में रखे हुए थे कि तुम्हें उससे इश्क़ है। असल में, तुम्हें उससे कभी इश्क़ था ही नहीं।

मैं यह बात इतने दावे से इसलिए कह रही हूँ, क्योंकि जब से मैं उस सरदार लड़के से मिली हूँ, तब से आज तक वह मेरे ज़ेहन में बसा हुआ है।

उससे मिलकर ऐसा लगा जैसे पहली बार मुझे प्यार का एहसास हुआ हो।

गेहूं कटने के मौसम में सरदार जी अपने बेटे और दो-तीन और लोगों के साथ हार्वेस्टर लेकर हमारे गाँव आए थे। उनकी मेरे पिताजी से जान-पहचान थी। उन्होंने पिताजी से भोजन करने की बात कही। पिताजी ने हाँ कह दी और घर आकर माताजी से भोजन बनाने को कहा।

माताजी ने खाना बना दिया। फिर पिताजी खाना लेकर गए और मुझे पानी लेकर आने को कहा।

मैं पिताजी के साथ पानी लेकर गई। मैं उन लोगों के हाथ धुलवा रही थी और पिताजी खाना परोस रहे थे। वह लड़का सबसे आखिर में आया। अचानक हम दोनों की नज़रें मिलीं। मैं घबरा गई कि कहीं वह मुझसे कुछ कह न दे… पर उसने मुझे देखकर हल्की-सी मुस्कान दी और उस दबे हुए मुस्कान के साथ आगे बढ़ गया।

पिताजी को गेहूं कटवाना था, इसलिए वे उसकी तैयारी में लग गए और मुझे सबको ध्यान से खाना खिलाने और बर्तन घर ले जाने को कहा।

सब खाना खाकर चले गए, लेकिन वह फिर सबसे आखिर में खाकर उठा। मैंने उसका भी हाथ धुलवाया और सारे बर्तन लेकर घर आ गई।

थोड़ी देर बाद न जाने मुझे क्या होने लगा… पूरे शरीर में घबराहट, बुखार जैसा एहसास और सीने में एक अजीब-सी टीस… लेकिन मैं समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या है।

शाम हुई तो पिताजी ने मुझे चाय लेकर जाने को कहा।

इस बार जब मैं चाय लेकर जा रही थी, न जाने मुझे किस बात की जल्दी थी। मेरे कदम खुद-ब-खुद तेज़ हो गए… जैसे कोई प्यासा समंदर की ओर दौड़ रहा हो।

जब मैं वहाँ पहुँची, तो मेरी निगाहें उसी को ढूँढ रही थीं। मैंने सबको चाय देना शुरू किया। इस बार भी वह देर से आया। ऐसा लग रहा था जैसे वह जान-बूझकर देर से आता हो, ताकि वह मुझे और मैं उसे थोड़ी देर और देख सकूँ।

इस बार मैंने सोच लिया था कि मैं उससे बात ज़रूर करूँगी।

मैंने उससे पूछा, “कब तक रहना है यहाँ?”

उसने कहा, “बस चाय पीकर अभी निकल जाएँगे।”

यह सुनते ही जैसे किसी ने मेरी रूह खींच ली हो। अंदर इतनी तेज़ लहर उठी कि गले में असहनीय दर्द होने लगा।

लेकिन खुद को रुलाने से बेहतर, उसके जाने के उस पल को यादगार बनाना ज़रूरी समझा।

मैंने उससे उसका नाम पूछा। उसने जाते हुए कदमों में ही कहा—

“कुलविंदर।”

यह कहकर वह चला गया… पर जब वह जा रहा था, तो ऐसा लग रहा था जैसे वह जाना नहीं चाहता था। शायद उसके मन में भी मेरे लिए कुछ था।

जब मैं घर आई, तो न जाने क्यों रोना आ रहा था। खुद को बहुत रोकने की कोशिश की, लेकिन गले में दर्द बढ़ता ही जा रहा था… क्योंकि जब मैं अपने आँसू रोकती हूँ, तो गला दुखने लगता है।

फिर यही सोचकर सब्र कर लिया—

जिस तरह क़ुदरत ने इस बार मुझे उससे मिलाया है, शायद आगे भी मिलाए…

बस इसी उम्मीद के सहारे मैं आज भी ज़िंदा हूँ… 🙏

Viyasmani Tripaathi

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