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अष्टांग योग में ‘स्वाध्याय’ से होता है आत्मबोध और जीवन का उत्थान: डॉ. नवीन सिंह

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती। अष्टांग योग के दूसरे अंग नियम का उद्देश्य व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उत्थान को सुनिश्चित करना है। शौच, संतोष और तप के पश्चात नियम का चौथा महत्वपूर्ण अंग स्वाध्याय है, जो आत्मचिंतन और आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त करता है। यह विचार डॉ. नवीन सिंह, योगाचार्य, पतंजलि योग पीठ हरिद्वार यूनिट बस्ती ने व्यक्त किए।
डॉ. नवीन सिंह ने बताया कि स्वाध्याय दो शब्दों स्व और अध्याय से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है—अपने बारे में जानने के लिए आर्ष ग्रंथों का पठन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना। स्वाध्याय के माध्यम से साधक को स्वयं से पाँच महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर खोजने होते हैं—मैं कौन हूं, मैं कहां से आया हूं, मुझे क्या करना चाहिए, मैं क्या कर रहा हूं और मुझे कहां जाना है।
उन्होंने कहा कि इन प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए वेद, उपनिषद, गीता जैसे आर्ष ग्रंथों का अध्ययन, विद्वानों के वचनों का श्रवण, तथा पढ़े-सुने ज्ञान का मनन कर उसे जीवन में उतारना आवश्यक है। यही प्रक्रिया वास्तविक स्वाध्याय कहलाती है। आज के समय में स्वाध्याय को केवल सेल्फ स्टडी समझ लिया गया है, जबकि स्वयं को पढ़ना और समझना भी उतना ही आवश्यक है।
डॉ. सिंह ने बताया कि स्वाध्याय के अनुष्ठान से ईश्वर, जीव और प्रकृति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। इससे ईश्वर के प्रति आस्था दृढ़ होती है और जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य एवं विवेक से निर्णय लेने की शक्ति विकसित होती है। उन्होंने प्राचीन परंपरा का उल्लेख करते याद दिलाया कि शिक्षा पूर्ण होने पर दीक्षा के समय यह संकल्प दिलाया जाता था—“स्वाध्याय प्रवचनाभ्याम मा प्रमदितव्यम” अर्थात स्वाध्याय और प्रवचन में कभी प्रमाद न करें।
उन्होंने कहा कि इसी संस्कार के कारण विद्यार्थी समाज में जाकर पुरुषार्थ के साथ राष्ट्र और आत्मिक उन्नति के लिए कार्य करते थे। अंत में डॉ. नवीन सिंह ने सभी से आह्वान किया कि स्वाध्याय को जीवन का अंग बनाकर अपने जीवन को सार्थक और मूल्यवान बनाएं।
उन्होंने बताया कि इस क्रम में अगली कड़ी में ईश्वर प्रणिधान के विषय में विस्तार से चर्चा की जाएगी।

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