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महात्मा गांधी की हत्या के बाद ब्राह्मणों पर हुई हिंसा की न्यायिक जांच की मांग, पीएम को भेजा ज्ञापन
1948 में चितपावन ब्राह्मणों पर हुई हिंसा की स्वतंत्र और समग्र जांच की उठी मांग

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती, 30 जनवरी।
महात्मा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1948 में चितपावन ब्राह्मण समुदाय के विरुद्ध हुई कथित संगठित हिंसा, हत्या, आगजनी, विस्थापन और संपत्ति-नाश की घटनाओं की पुनः और समग्र न्यायिक जांच की मांग उठाई गई है। इस संबंध में कौटिल्य वार्ता (कौटिल्य न्यूज ट्रस्ट) के संस्थापक राजेंद्र नाथ तिवारी ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को संबोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी बस्ती के माध्यम से भेजा।
ज्ञापन में कहा गया है कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी (वर्तमान महाराष्ट्र) और आसपास के क्षेत्रों में चितपावन ब्राह्मण समुदाय को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। इस दौरान कई लोगों की हत्या कर दी गई, घरों और संपत्तियों को जला दिया गया, सामाजिक बहिष्कार किया गया और बड़ी संख्या में परिवारों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
संस्था का आरोप है कि आज तक इन घटनाओं की कोई स्वतंत्र, आधिकारिक और समग्र न्यायिक जांच नहीं कराई गई, जिसके कारण पीड़ित परिवारों का दर्द और उनकी त्रासदी राज्य के आधिकारिक अभिलेखों में दर्ज नहीं हो सकी।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि कपूर आयोग (1966-69) की जांच केवल महात्मा गांधी की हत्या और उससे जुड़े षड्यंत्र तक ही सीमित रही, जबकि 1948 में हुई सामुदायिक हिंसा को उसके अधिकार क्षेत्र में शामिल नहीं किया गया। इससे हजारों पीड़ितों को न तो न्याय मिल सका और न ही किसी प्रकार की सरकारी मान्यता।
राजेंद्र नाथ तिवारी ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी समुदाय के विरुद्ध हुई संगठित हिंसा की जांच करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। ऐसी घटनाओं पर लंबे समय तक चुप्पी साधे रखना संवैधानिक नैतिकता के विपरीत है।
उन्होंने कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट, 1952 के तहत एक स्वतंत्र, उच्चस्तरीय और समयबद्ध न्यायिक आयोग गठित करने की मांग की है। प्रस्तावित आयोग के कार्यक्षेत्र में—
1948 की हिंसा का तथ्यात्मक निर्धारण
मृतकों और विस्थापितों का आधिकारिक आंकड़ा तैयार करना
प्रशासनिक विफलता या राज्य संरक्षण की भूमिका की जांच
पीड़ित परिवारों के लिए न्याय और क्षतिपूर्ति की संस्तुति
को शामिल करने की मांग की गई है।
ज्ञापन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह मांग किसी भी प्रकार की प्रतिशोधात्मक राजनीति या किसी समुदाय के विरोध में नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य ऐतिहासिक सत्य, राष्ट्रीय आत्मालोचन और संवैधानिक न्याय की स्थापना करना है। संस्था ने मांग की है कि आयोग की रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत कर सार्वजनिक की जाए, ताकि देश के इतिहास के इस संवेदनशील अध्याय पर आधिकारिक सत्य सामने आ सके।

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