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चंद्रशेखर उर्फ फरसा वाले बाबा के मृत्यु की उच्चस्तरीय जांच हो और दोषियों को कठोरतम दण्ड दिया जाय-ओम प्रकाश आर्य

 बस्ती 22मार्च।

*चंद्रशेखर उर्फ फरसा वाले बाबा के मृत्यु की उच्चस्तरीय जांच हो और दोषियों को कठोरतम दण्ड दिया जाय-ओम प्रकाश आर्य*

आर्य समाज नई बाजार बस्ती के साप्ताहिक सत्संग में वैदिक यज्ञ के पश्चात मथुरा में हुए विख्यात गौसेवक चंद्रशेखर उर्फ फरसा बाबा की दुर्घटना में हुई मृत्यु के जांच की मांग की गई है। इस अवसर पर ओम प्रकाश आर्य प्रधान आर्य समाज नई बाजार बस्ती ने उनकी मृत्यु पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि

मथुरा की पावन भूमि, जहाँ कभी श्रीकृष्ण ने गोचारण करते हुए गायों के प्रति प्रेम, संरक्षण और करुणा का संदेश दिया था, आज वहीं से एक ऐसी दर्दनाक खबर सामने आती है जो न केवल मानवता को झकझोरती है, बल्कि हमारे कानून, प्रशासन और सामाजिक चेतना पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। गौ-भक्ति में जीवन समर्पित करने वाले संत श्री चंद्रशेखर बाबाजी, जिन्हें लोग श्रद्धा से “फरसा वाले बाबा” के नाम से जानते थे, उन्हें गौ-तस्करों द्वारा बेरहमी से वाहन से कुचल कर मार डाला गया। यह घटना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि उन मूल्यों की हत्या है जिन पर भारतीय संस्कृति खड़ी है।

यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यही वह स्वतंत्र भारत है, जहाँ गौ-रक्षा के लिए आगे आने वाले संतों और समाजसेवियों को इस प्रकार मौत के घाट उतार दिया जाएगा? क्या “गाय हमारी माता है” का उद्घोष केवल मंचों और नारों तक सीमित रह गया है?

गौवंश के प्रति श्रद्धा भारत की आत्मा में रची-बसी है। वेदों में गाय को “अघ्न्या” कहा गया है, अर्थात् जिसे मारना पाप है। महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी गौ-रक्षा को राष्ट्रधर्म बताया था। परंतु आज की स्थिति यह है कि संगठित गौ-तस्करी के गिरोह खुलेआम कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए न केवल गौवंश का संहार कर रहे हैं, बल्कि जो लोग इसका विरोध करते हैं, उन्हें भी निर्ममता से कुचल दिया जाता है।

यह घटना कानून व्यवस्था पर एक तीखा तमाचा है। यदि एक संत, जो समाज के लिए समर्पित है, खुलेआम सड़कों पर मारा जाता है, तो आम नागरिक की सुरक्षा का क्या आश्वासन बचता है? यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक गहरी संवेदनहीनता का प्रमाण है।

आज आवश्यकता है कि इस घटना को केवल एक दुर्घटना या सामान्य अपराध मानकर न टाल दिया जाए। यह एक संगठित अपराध है, जिसमें कठोरतम दंड की आवश्यकता है। दोषियों को शीघ्र गिरफ्तार कर फास्ट ट्रैक न्यायालय में सुनवाई हो और उन्हें ऐसा दंड मिले जो समाज में भय और न्याय दोनों स्थापित करे। कानून को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या वर्तमान गौ-रक्षा संबंधी कानून पर्याप्त हैं? यदि हैं, तो उनका पालन क्यों नहीं हो रहा? यदि नहीं हैं, तो उन्हें और सशक्त बनाने की आवश्यकता है। केवल कागजों पर कानून बनाना पर्याप्त नहीं, उसका कठोर और निष्पक्ष क्रियान्वयन ही वास्तविक न्याय है।

इसके साथ ही समाज को भी आत्मनिरीक्षण करना होगा। गौ-रक्षा केवल सरकार का कार्य नहीं, यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक समाज जागरूक और संगठित नहीं होगा, तब तक ऐसे अपराध रुकने वाले नहीं हैं।

यह घटना हमें यह भी सिखाती है कि संगठन और समन्वय की कितनी आवश्यकता है। यदि स्थानीय स्तर पर मजबूत निगरानी तंत्र, जागरूक नागरिक और सक्रिय प्रशासन हो, तो गौ-तस्करी जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।

आज आवश्यकता है कि हम केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया न दें, बल्कि एक संगठित, वैचारिक और कानूनी संघर्ष की दिशा में आगे बढ़ें। गौ-रक्षा को राजनीतिक विवाद से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में देखा जाए।

अंत में, यह घटना हम सबके लिए एक चेतावनी है—यदि हम आज नहीं जागे, तो कल हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य और हमारी पहचान भी इसी प्रकार कुचल दिए जाएंगे। संत श्री चंद्रशेखर बाबाजी का बलिदान व्यर्थ न जाए, इसके लिए हमें संकल्प लेना होगा कि हम न्याय की इस लड़ाई को अंत तक लड़ेंगे।

“जहाँ धर्म है, वहीं विजय है”—यह केवल शास्त्रों की पंक्ति नहीं, बल्कि एक आह्वान है कि हम धर्म, न्याय और करुणा के मार्ग पर अडिग रहें। इस अवसर पर नितीश कुमार, गणेश आर्य, गरुण ध्वज पाण्डेय, विश्वनाथ, उपेन्द्र आर्य, शिव श्याम, रजनीश चौधरी, धर्मेंद्र कुमार, रिमझिम, अरविन्द साहू, नीलम मिश्रा,राजेश्वरी, दृष्टि, पुनीत राज, परी, राधा देवी सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।

गरुण ध्वज पाण्डेय

Viyasmani Tripaathi

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